महेश गुप्ता, नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने 15 साल पुराने लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि इतने लंबे समय तक सहमति से चले रिश्ते को केवल “शादी के झूठे वादे पर रेप” के आपराधिक केस के रूप में नहीं देखा जा सकता। कोर्ट ने यह टिप्पणी उस याचिका की सुनवाई के दौरान की, जिसमें मध्यप्रदेश हाईकोर्ट द्वारा आरोपी पुरुष के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द किए जाने के फैसले को चुनौती दी गई थी।
महिला ने लगाए गंभीर आरोप
महिला का आरोप है कि आरोपी पुरुष ने शादी का झूठा वादा कर उसके साथ संबंध बनाए और यह तथ्य छुपाया कि वह पहले से शादीशुदा है। महिला ने इसे यौन शोषण बताते हुए आपराधिक कार्रवाई की मांग की।
सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि जब दोनों पक्ष 15 वर्षों तक सहमति से साथ रहे, लिव-इन रिलेशनशिप में रहे और एक बच्चा भी हुआ, तो ऐसे मामले को सीधे अपराध कैसे माना जा सकता है।
कोर्ट ने यह भी पूछा कि यदि रिश्ता सहमति पर आधारित था, तो इतने वर्षों बाद शिकायत क्यों दर्ज कराई गई।
अलगाव अपने आप में अपराध नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप में अलग होना अपने आप में अपराध नहीं माना जा सकता। यदि कोई व्यक्ति ऐसे रिश्ते से बाहर निकलता है, तो यह उस संबंध का एक जोखिम भी हो सकता है।
महिला पक्ष की दलील
महिला के वकील ने कोर्ट को बताया कि शिकायतकर्ता कम उम्र में विधवा हो गई थी और आरोपी ने उसकी कमजोर स्थिति का फायदा उठाया। साथ ही यह भी कहा गया कि आरोपी पहले से विवाहित था और उसने यह बात छुपाई।
कोर्ट ने बच्चे के भरण-पोषण पर दिया जोर
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि दोनों की शादी हुई होती, तो महिला को भरण-पोषण और द्विविवाह कानूनों का लाभ मिल सकता था। लेकिन लिव-इन संबंधों में ऐसे कानूनी जोखिम बने रहते हैं।
कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि आपराधिक मुकदमेबाजी के बजाय बच्चे के भरण-पोषण और आर्थिक सहायता जैसे व्यावहारिक समाधान अधिक उचित हो सकते हैं।
मेडिएशन का सुझाव, अगली सुनवाई 25 मई को
सुप्रीम Court ने दोनों पक्षों को मेडिएशन का सुझाव दिया है और आरोपी पुरुष को नोटिस जारी करते हुए मामले की अगली सुनवाई 25 मई तय की है। कोर्ट अब यह देखेगा कि दोनों पक्षों के बीच कोई समझौता संभव है या नहीं।









