महेश गुप्ता, नई दिल्ली
चुनाव से ठीक पहले सरकारों द्वारा मुफ्त योजनाओं और नकद ट्रांसफर की घोषणाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए पूछा कि आखिर यह परंपरा कब तक जारी रहेगी और क्यों चुनाव नजदीक आते ही नई-नई योजनाओं का ऐलान होने लगता है?
यह मामला 2022 में दायर उस याचिका से जुड़ा है, जिसमें चुनावी ‘फ्रीबीज’ पर रोक लगाने की मांग की गई थी। हाल ही में जब इस मुद्दे को फिर अदालत में उठाया गया, तो सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि वह मार्च में इस पर विस्तृत सुनवाई करेगा।
पिछली सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा था कि 2013 के Subramaniam Balaji v. State of Tamil Nadu फैसले पर दोबारा विचार करने की जरूरत हो सकती है। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि चुनावी घोषणापत्र में किए गए वादे भ्रष्ट आचरण (करप्ट प्रैक्टिस) की श्रेणी में नहीं आते। अब कोर्ट यह परखना चाहता है कि बदलते आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्य में उस निर्णय की प्रासंगिकता कितनी है।
हालिया टिप्पणियों में मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ ने यह भी सवाल किया कि यदि किसी राज्य के पास राजस्व अधिशेष (सरप्लस) है, तो क्या उसका पहला दायित्व बुनियादी ढांचे—जैसे सड़क, अस्पताल और स्कूल—के विकास पर खर्च करना नहीं होना चाहिए? अदालत ने राजनीतिक दलों से इस विषय पर गंभीर मंथन करने की अपील की।
फरवरी 2025 में सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह टिप्पणी भी की थी कि मुफ्त राशन और आर्थिक सहायता की निरंतरता से लोगों की कार्य-प्रेरणा प्रभावित हो सकती है। इससे पहले अगस्त 2022 में अदालत ने सुझाव दिया था कि इस जटिल मुद्दे पर विचार के लिए एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति गठित की जा सकती है, जो ‘फ्रीबीज’ की परिभाषा और उनके आर्थिक प्रभाव पर स्पष्ट राय दे।
अदालत ने यह भी कहा था कि यह विषय बेहद गंभीर है, क्योंकि करदाताओं का यह अधिकार है कि वे जानें—सरकारी धन का उपयोग किस प्रकार हो रहा है। राजनीतिक दलों की चुप्पी पर भी कोर्ट ने टिप्पणी की थी, यह कहते हुए कि लगभग सभी दल चुनावों में मुफ्त योजनाओं का सहारा लेते हैं।
यह याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गई थी, जिसमें चुनाव आचार संहिता लागू रहने के दौरान महिला मतदाताओं को 10 हजार रुपये ट्रांसफर करने को चुनौती दी गई थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने अहम प्रश्न उठाया—क्या मुफ्त शिक्षा और मुफ्त पानी भी ‘फ्रीबीज’ की श्रेणी में आएंगे? आखिर कल्याणकारी योजनाओं और वोट प्रभावित करने वाली घोषणाओं के बीच रेखा कहां खींची जाए?
अब नजरें मार्च में होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय हो सकता है कि चुनावी ‘मुफ्त वादों’ पर भविष्य में किस तरह की संवैधानिक और कानूनी कसौटी लागू होगी।









