महेश गुप्ता, नई दिल्ली
फिल्म के नाम पर बढ़ा विवाद, सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
फिल्म घूसखोर पंडित के शीर्षक को लेकर शुरू हुआ विवाद अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गया है। Supreme Court of India ने फिल्म के निर्माताओं और ओटीटी प्लेटफॉर्म Netflix को नोटिस जारी करते हुए सख्त रुख अपनाया है।
अदालत ने स्पष्ट कहा कि सिनेमा के नाम या कंटेंट के जरिए किसी भी समुदाय या वर्ग की भावनाओं को ठेस पहुंचाना स्वीकार्य नहीं है। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि कई बार विवादित शीर्षकों का इस्तेमाल पब्लिसिटी के लिए किया जाता है, लेकिन यह प्रवृत्ति उचित नहीं मानी जा सकती।
ब्राह्मण संगठनों का विरोध, एफआईआर तक पहुंचा मामला
फिल्म के टीजर लॉन्च (3 फरवरी) के बाद से ही ‘पंडित’ शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई जा रही है। लखनऊ के हजरतगंज थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई, जबकि प्रयागराज में परशुराम सेना ने विरोध प्रदर्शन किया।
Vishva Hindu Parishad (वीएचपी) ने इसे ब्राह्मण समाज पर सीधा हमला बताया। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि फिल्म का शीर्षक एक विशेष समुदाय को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत करता है, जिससे सामाजिक सद्भाव प्रभावित हो सकता है।
दिल्ली हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक
इससे पहले Delhi High Court में सुनवाई के दौरान नाम बदलने की सहमति के आधार पर याचिका निपटा दी गई थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दोबारा सुनवाई करते हुए नोटिस जारी किया है।
अब अगली सुनवाई 19 फरवरी को होगी, जहां यह तय किया जाएगा कि फिल्म किस नाम से रिलीज होगी और क्या कंटेंट में किसी वर्ग के खिलाफ आपत्तिजनक तत्व मौजूद हैं।
निर्माताओं की सफाई, लेकिन विवाद बरकरार
फिल्म में अभिनेता Manoj Bajpayee एक भ्रष्ट पुलिस अधिकारी ‘अजय दीक्षित’ की भूमिका में नजर आने वाले हैं। फिल्म के निर्देशक Neeraj Pandey ने सफाई देते हुए कहा कि कहानी किसी जाति विशेष पर नहीं, बल्कि एक कमजोर और भ्रष्ट चरित्र की व्यक्तिगत यात्रा पर आधारित है।
इसके बावजूद विरोध थमता नजर नहीं आ रहा। समाजवादी पार्टी प्रमुख Akhilesh Yadav ने भी सोशल मीडिया पर इसे जातिवादी करार देते हुए अपनी प्रतिक्रिया दी है।
टाइटल पर ही क्यों केंद्रित है विवाद?
विवाद की जड़ फिल्म के नाम में प्रयुक्त ‘पंडित’ शब्द है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह शब्द एक विशिष्ट समुदाय की पहचान से जुड़ा है और उसे भ्रष्टाचार के साथ जोड़ना आपत्तिजनक है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। सिनेमा रचनात्मक स्वतंत्रता का माध्यम है, लेकिन संवेदनशील शब्दों के इस्तेमाल में सावधानी भी अपेक्षित है।
रिलीज पर सस्पेंस
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद अब फिल्म की रिलीज पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। निर्माताओं पर नाम बदलने और कंटेंट की समीक्षा का दबाव बढ़ गया है।
अब सबकी निगाहें 19 फरवरी की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां अदालत यह तय करेगी कि फिल्म मौजूदा नाम के साथ रिलीज हो सकती है या उसे नया शीर्षक देना होगा।









