Sweta Ranjan, New Delhi
देश में लंबे समय से “एक देश-एक चुनाव” का मुद्दा चर्चा में है। अब केंद्र सरकार इसे लागू करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाने जा रही है। सोमवार को कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल इस पर एक बिल लोकसभा में पेश करेंगे। सरकार का दावा है कि इससे न केवल चुनावी प्रक्रिया आसान होगी, बल्कि देश के विकास को भी रफ्तार मिलेगी। आइए जानते हैं “वन नेशन, वन इलेक्शन” से जुड़ी हर अहम जानकारी।
क्या है ‘एक देश-एक चुनाव’?
“एक देश-एक चुनाव” का मतलब है कि लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाएं। इस मॉडल के तहत हर पांच साल में एक ही बार देशभर में चुनाव होगा, जिससे बार-बार चुनाव कराने की जरूरत खत्म हो जाएगी।
1951 में ‘एक देश-एक चुनाव’ का मॉडल पहले से लागू था
भारत में “एक देश-एक चुनाव” कोई नई अवधारणा नहीं है।
- 1951-52 में जब देश में पहली बार आम चुनाव हुए, तब लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ हुए थे।
- यह मॉडल 1967 तक लागू रहा।
- लेकिन 1968 और 1969 में कुछ विधानसभाएं समय से पहले भंग हो गईं। इसके बाद 1970 में लोकसभा भी समय से पहले भंग कर दी गई।
- इन घटनाओं के चलते देश में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव अलग-अलग समय पर होने लगे।
सरकार का तर्क: क्यों जरूरी है यह योजना?
सरकार का कहना है कि बार-बार चुनाव कराने से:
- भारी खर्च: हर चुनाव में हजारों करोड़ रुपये खर्च होते हैं।
- सरकारी कामकाज पर असर: आचार संहिता लागू होने से सरकारी योजनाएं और विकास कार्य ठप हो जाते हैं।
- प्रशासनिक दबाव: बार-बार चुनाव कराने से पुलिस और अन्य प्रशासनिक संसाधनों पर दबाव बढ़ता है।
पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में बनी समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया कि एक देश-एक चुनाव से देश की जीडीपी (GDP) में 1 से 1.5% तक वृद्धि हो सकती है।
विपक्ष का विरोध: क्या हैं तर्क?
विपक्षी दलों, खासकर इंडिया ब्लॉक ने इस योजना का विरोध किया है।
- तर्क 1: उनका कहना है कि यह मॉडल केंद्र में सत्तारूढ़ दल को फायदा पहुंचा सकता है।
- तर्क 2: देश जैसे बड़े और विविधतापूर्ण लोकतंत्र में यह प्रणाली लागू करना व्यवहारिक नहीं है।
- तर्क 3: अलग-अलग राज्यों के मुद्दे और राजनीतिक परिस्थितियां अलग होती हैं।
कांग्रेस का कहना है कि यह भारत के संघीय ढांचे के खिलाफ है।
बिल को JPC में क्यों भेजा जाएगा?
सरकार का इरादा है कि इस बिल को संयुक्त संसदीय समिति (JPC) में भेजा जाए।
- JPC में सभी दलों के प्रतिनिधि शामिल होंगे।
- यहां विस्तृत चर्चा और सुझाव के बाद इसे लागू करने का निर्णय लिया जाएगा।
क्या हैं ‘एक देश-एक चुनाव’ के फायदे?
- खर्च में कमी:
वर्तमान में चुनाव कराने में 5-5.5 लाख करोड़ रुपये खर्च होते हैं। इस मॉडल के तहत खर्च घटकर सिर्फ 50 हजार करोड़ रुपये रह जाएगा। - विकास कार्यों में तेजी:
बार-बार चुनाव होने से सरकारी योजनाएं प्रभावित होती हैं। एक साथ चुनाव होने से यह बाधा दूर हो जाएगी। - समय और संसाधन की बचत:
प्रशासन और सुरक्षाबलों को बार-बार चुनावी प्रक्रिया में शामिल होने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
क्या हैं चुनौतियां?
- संवैधानिक अड़चनें:
राज्यों की स्वायत्तता और संघीय ढांचे पर असर पड़ सकता है। - सिंक करने की समस्या:
यदि किसी राज्य की सरकार समय से पहले गिरती है तो पूरे देश में चुनाव कैसे कराए जाएंगे? - बड़े पैमाने पर तैयारी:
एक साथ चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग और अन्य एजेंसियों को बहुत बड़े पैमाने पर तैयारी करनी होगी।









