नई दिल्ली:
केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने स्पष्ट किया है कि दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में खनन की अनुमति नहीं दी जाएगी और अरावली पर्वतमाला के संरक्षित वन व इलाके पूरी तरह सुरक्षित रहेंगे। उन्होंने कहा, “दिल्ली, नूंह, फरीदाबाद और गुरुग्राम में किसी भी तरह का खनन नहीं होगा।”
भूपेंद्र यादव यह बात गैर-लाभकारी संस्था संकला फाउंडेशन द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट “अरावली लैंडस्केप का इको-रिस्टोरेशन” जारी करते हुए कही। यह रिपोर्ट अरावली क्षेत्र में जैव विविधता, पारिस्थितिकी सेवाओं और जलवायु सहनशीलता को मजबूत करने के लिए एक एकीकृत, लैंडस्केप आधारित और दोहराने योग्य इको-रिस्टोरेशन मॉडल प्रस्तुत करती है।
मंत्री ने बताया कि अरावली पर्वतमाला में चार टाइगर रिज़र्व और 18 संरक्षित क्षेत्र शामिल हैं। इनमें से 13 राजस्थान, तीन हरियाणा और दो गुजरात में स्थित हैं। यह पूरा नेटवर्क अरावली क्षेत्र के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
उन्होंने कहा कि भूमि क्षरण रोकने और जैव विविधता संरक्षण के लिए अरावली ग्रीन वॉल परियोजना पर काम किया जा रहा है। भारत ने यह परियोजना वर्ष 2023 में संयुक्त राष्ट्र के मरुस्थलीकरण से निपटने के सम्मेलन (UNCCD) के तहत शुरू की थी। इसका उद्देश्य वर्ष 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर क्षतिग्रस्त भूमि का पुनर्स्थापन करना है।
गौरतलब है कि हाल ही में अरावली के संरक्षण को लेकर चिंताएं तब बढ़ गई थीं, जब सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सचिव की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशों को मंजूरी देते हुए अरावली की सीमाओं को फिर से परिभाषित करने की अनुमति दी थी। इस पुनर्परिभाषा में केवल 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों को अरावली माना गया, जिससे करीब 90 प्रतिशत अरावली क्षेत्र ओपन-कास्ट माइनिंग के लिए संवेदनशील हो सकता था।
हालांकि, भूपेंद्र यादव ने अदालत के आदेश का बचाव करते हुए कहा कि यह फैसला संरक्षण प्रयासों को मजबूती देगा। यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट की केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) की सलाह के विपरीत था। चारों राज्यों में जन आक्रोश के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस फैसले की समीक्षा करने पर सहमति जताई है।









