नेशनलखबर ब्यूरो, नई दिल्ली
रंगों के पर्व होली में जहां पूरा देश गुलाल और अबीर में सराबोर होता है, वहीं वाराणसी में एक ऐसी होली खेली जाती है, जो रंगों से नहीं बल्कि राख से सजी होती है। इसे मसान होली कहा जाता है—एक ऐसी परंपरा जो आध्यात्म, वैराग्य और मृत्यु के सत्य को स्वीकार करने का प्रतीक है।
इस वर्ष मसान होली 28 फरवरी को मनाई जाएगी। हालांकि इस बार इसे लेकर विवाद भी खड़ा हो गया है। काशी विद्वत परिषद ने मणिकर्णिका घाट पर होने वाली इस होली पर आपत्ति जताई है। परंपरागत रूप से यह आयोजन हरिश्चंद्र घाट पर होता आया है, जो काशी के प्राचीनतम श्मशान घाटों में गिना जाता है।
कब और कैसे होती है शुरुआत?
मसान होली का आरंभ रंगभरी एकादशी से माना जाता है। अगले दिन सुबह बाबा महाशमशान नाथ की विशेष आरती के बाद लगभग 10 बजे यह अनूठा आयोजन शुरू होता है।
हरिश्चंद्र घाट पर स्थित मंदिर में पूजा-अर्चना के पश्चात श्मशान घाट का वातावरण डमरू की थाप, “हर-हर महादेव” के जयकारों और मंत्रोच्चार से गूंज उठता है। इसके बाद साधु-संत चिताओं की ताजी भस्म को प्रसाद स्वरूप एक-दूसरे पर लगाते हैं।
कौन होते हैं शामिल?
मसान होली को भगवान शिव के गणों का उत्सव माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शिव के गण वे दिव्य सेवक हैं जिन्हें भूत, प्रेत और तपस्वी स्वरूप में देखा जाता है।
इस परंपरा में मुख्य रूप से अघोरी, नागा साधु, संन्यासी और स्थानीय शिवभक्त भाग लेते हैं। वे श्मशान में एकत्र होकर भस्म से होली खेलते हैं।
हाल के वर्षों में बड़ी संख्या में पर्यटक भी इस आयोजन को देखने पहुंचने लगे हैं। हालांकि धार्मिक जानकार बार-बार यह स्पष्ट करते हैं कि यह कोई “टूरिस्ट शो” नहीं, बल्कि अत्यंत संवेदनशील धार्मिक अनुष्ठान है। जिम्मेदारियों से जुड़े लोग—जैसे विद्यार्थी, विवाहित व्यक्ति और बच्चे—प्रत्यक्ष रूप से राख से होली खेलने से बचें, यही सलाह दी जाती है।
पौराणिक कथा और आध्यात्मिक अर्थ
मसान होली की जड़ें शैव परंपरा में गहराई से जुड़ी हैं। मान्यता है कि रंगभरी एकादशी पर भगवान शिव, देवी पार्वती का गौना कराकर काशी लौटे थे और नगरवासियों के साथ रंगों की होली खेली थी।
लेकिन उनके प्रिय गण, जो श्मशान में निवास करते हैं, इस उत्सव में शामिल नहीं हो पाए। कथा के अनुसार अगले दिन शिव स्वयं श्मशान पहुंचे और रंगों की जगह राख से अपने गणों के साथ होली खेली।
यह प्रतीक है—समानता का, वैराग्य का और जीवन-मृत्यु के शाश्वत चक्र को स्वीकार करने का। चिता की भस्म इस सत्य की याद दिलाती है कि अंततः हर शरीर राख में परिवर्तित हो जाता है। श्मशान में होली मनाकर भक्त मृत्यु के भय पर विजय और मोक्ष की भावना को आत्मसात करने का प्रयास करते हैं।
परंपरा और विवाद के बीच
इस वर्ष मसान होली को लेकर उठे विरोध ने परंपरा और आस्था पर नई बहस छेड़ दी है। एक ओर इसे शिवभक्ति और सनातन परंपरा का गूढ़ रूप माना जाता है, तो दूसरी ओर कुछ विद्वान इसके स्वरूप और आयोजन स्थल को लेकर आपत्ति जता रहे हैं।
फिर भी, काशी की मसान होली आज भी आस्था, आध्यात्म और जीवन के अंतिम सत्य का अनूठा संगम बनी हुई है—जहां रंग नहीं, बल्कि राख के माध्यम से जीवन का दर्शन होता है।









