बिहार में जातिगत कारक चुनाव के समय में राजनीतिक दलों द्वारा उठाए गए अन्य मुद्दों पर अक्सर भारी पड़ते नजर आते हैं। मुस्लिम कांग्रेस पर बैंकिंग करते रहे हैं, भाजपा हिंदुओं पर। भारत की राजनीति में एक लोकप्रिय कहावत भी है, ‘जाति नहीं जाती’। मतलब ये कि भारत में जाति कभी भी चुनाव से बाहर नहीं जाती है। बिहार में चुनाव कोई भी हो पार्टी को पूरी तरह से जातिगत अंकगणित में फिट होना होता है। एक ऐसा प्रदेश जहां बात जाति से शुरू होती है और जाति पर ही खत्म होती है। ऐसे में एक ऐसे पार्टी के लिए कितनी जगह रह जाती है जो जाति की बात ही ना करे। जी हां पुष्पम प्रिया चौधरी, जो अपने एक अलग ही अंदाज़ के लिए सुर्खियों में रहती हैं- चाहे खुद को मुख्ममंत्री पद के लिए उम्मीदवार घोषित करने का अंदाज़ हो या फिर चुनावी मुद्दे हों। इस बार तो उन्होंने कुछ ऐसा किया है जिसपर बिहार की जमीन पर चुनाव लड़कर जीतने की कल्पना भी नहीं की सकती।
पुष्पम प्रिया चौधरी की पार्टी प्लूरल्स ने पहले चरण के बिहार विधानसभा चुनाव के लिए अपने उम्मीदवारों की जो पहली सूची जारी की है उसमें दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने उम्मीदवारों की जाति कॉलम में उनके पेशे का जिक्र जैसे सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षक, किसान, प्रोफेसर, वकील, इंजीनियर, मर्चेंट नेवी, डॉक्टर और साथ ही धर्म के कॉलम में बिहारी लिखा है।
बिहार की जनता को जाहिर तौर पर इस बात से हैरत होगी। अगर बिहार की जातिगत संरचना का विश्लेषण करें तो बिहार की लगभग 56% आबादी अन्य पिछड़े वर्गों की है। उनमें से, 16% यादव ओबीसी हैं और बाकी 40% गैर-यादव ओबीसी माने जाते हैं। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव, जैसा कि नाम से पता चलता है कि बिहार के 16% यादव ओबीसी का बहुत वफादार वोट बैंक है। जबकि गैर-यादव वोट भारतीय जनता पार्टी और जनता दल (यूनाइटेड) के बीच बांटे गए हैं, जो वर्तमान में बिहार सरकार के पास हैं।
गैर-यादव ओबीसी वोट 2009 के लोकसभा चुनावों के बाद से भाजपा-जदयू गठबंधन को पसंद करते हैं। इसके अलावा, 2014 का लोकसभा चुनाव थोड़ा खास था क्योंकि कई युवा मतदाता जाति की राजनीति से ऊपर उठकर नरेंद्र मोदी को वोट देते थे। यह पूरी संभावना है कि यह समूह बिहार विधानसभा चुनाव 2020 के लिए भी भाजपा-जदयू गठबंधन के प्रति वफादार रहेगा।
सवर्णों की संख्या पूरे बिहार की आबादी का 15% है। उनमें ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत और कायस्थ शामिल हैं। यह भाजपा की हिंदू विचारधारा के कारण हो सकता है, लेकिन उच्च जातियां वास्तव में भारतीय जनता पार्टी के लिए अपना वोट डालती हैं। 1984 के बाद से, ये वोट कांग्रेस से बीजेपी में स्थानांतरित हो गए और अब भी बने हुए हैं।
तो बिहार में जहां जातिगत समीकरण चुनावों पर पूरी तरह हावी रहते हैं। नीतीश कुमार जीतनराम मांझी को अपने साथ लाकर महादलितों की वोट खिंचने की चाल चलते हैं, आरएलएसपी के मुखिया उपेंद्र कुशवाहा बसपा से गठबंधन कर दलितों की राजनीति करते दिख रहे हैं। चिराग पासवान की पार्टी लोजपा सत्ता की चाबी अपने हाथ में रखने की फिराक लगाए बैठी है। महागठबंधन बसपा के प्रदेश अध्यक्ष को अपने पाले में ले आते हैं ऐसे में पुष्पम प्रिया जाति के इस उधेड़बुन में उलझ कर तो नहीं रह जाएगीं। बिहार एक ऐसा प्रदेश है जहां अब भी जाति के आधार पर शादी-ब्याह होते है, रिश्ते बनते बिगड़ते हैं। तो फिर चुनाव तो दूर की बात है। यहां चुनाव का सबसे पहला और बड़ा मुद्दा जाति ही होता है। ऐसे में पुष्पम का जो एक नया कदम है वो सोच में बदलाव भी ला सकता है क्योंकि बिहार में 4 करोड़ युवा हैं। राज्य में 18 से 39 साल के युवा मतदाताओं की संख्या तीन करोड़ 66 लाख 34 हजार से अधिक है। यह संख्या कुल मतदाता (सात करोड़ 18 लाख) के करीब आधी है। लगभग 58% , ऐसे में युवाओं को लुभाने का एक अच्छा तरीका हो सकता है। क्योंकि आज का युवा जात-पात- धर्म के घेरे से निकल कर विकास, रोजगार जैसी जरूरतों पर अधिक ध्यान दे रहा है। सच कहूं तो बिहार को अब 15 years-15 years की लड़ाई से बाहर निकल सोचना ही होगा। और पुष्पम के विरोधी दल जो उन्हें कमजोर और अनुभवहीन समझ रहे हैं कहीं गलतफहमी में ना रहें।






